Bihar Chunav 2025: बिहार में वोटर लिस्ट पर घमासान, विपक्ष ने उठाए चुनाव आयोग पर सवाल, ममता बोलीं- यह NRC से भी खतरनाक

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rahul gandhi

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बिहार में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) शुरू करने के आदेश के बाद सियासी तूफान खड़ा हो गया है।

नई दिल्ली, पंचखबर डेस्क। बिहार में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) शुरू करने के आदेश के बाद सियासी तूफान खड़ा हो गया है। कांग्रेस, आरजेडी, वाम दलों से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए बीजेपी विपक्षी मतदाताओं को वोट देने से वंचित करना चाहती है।

क्या है चुनाव आयोग का नया आदेश?

चुनाव आयोग ने 24 जून को आदेश जारी करते हुए कहा कि बिहार में मतदाता सूची का विशेष सत्यापन किया जाएगा। यह प्रक्रिया 25 जून से शुरू होकर 30 सितंबर तक चलेगी। अंतिम मतदाता सूची 30 सितंबर को प्रकाशित होगी। इस प्रक्रिया के तहत हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से गणना फॉर्म भरना होगा। 1 जनवरी 2003 के बाद मतदाता बने लोगों को नागरिकता प्रमाण देना अनिवार्य होगा। दस्तावेजों में पासपोर्ट, जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता के वोटर ID, निवास प्रमाण पत्र आदि स्वीकार किए जाएंगे।

पहले क्या होता था, अब क्या बदला है?

अब तक BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) परिवार के मुखिया से ‘गणना पैड’ भरवाते थे। लेकिन अब हर नागरिक को अलग-अलग फॉर्म भरना होगा और जरूरी दस्तावेज देने होंगे। नए मतदाताओं को फॉर्म 6 के साथ एक घोषणापत्र (Declaration) भी देना होगा जिसमें नागरिकता की जानकारी स्पष्ट होनी चाहिए। महागठबंधन में शामिल दलों – आरजेडी, कांग्रेस, सीपीआई(एमएल) आदि – ने इस फैसले का विरोध करते हुए चुनाव आयोग पर सवाल उठाए। तेजस्वी यादव, राहुल गांधी, दीपंकर भट्टाचार्य ने आरोप लगाया कि यह बीजेपी की योजना है ताकि गरीबों, युवाओं और अल्पसंख्यकों के वोट काटे जा सकें। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया “चुनाव आयोग की स्वीकारोक्ति” है कि देश की वोटर लिस्ट ठीक नहीं है, और इससे विपक्षी मतदाताओं को बाहर रखने की साजिश की जा रही है।

ममता बनर्जी ने जताई कड़ी आपत्ति

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस प्रक्रिया को एनआरसी से भी ज्यादा खतरनाक बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे बंगाल के युवाओं और ग्रामीणों को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नए नियमों के मुताबिक 1987 से 2004 के बीच जन्मे लोगों को माता-पिता के जन्म प्रमाणपत्र देने होंगे, जो गरीब और ग्रामीण लोगों के लिए मुश्किल है। ममता ने यह भी कहा कि ये बदलाव ‘उधार के मतदाता’ जोड़ने की साजिश है ताकि हार से बचा जा सके।

चुनाव आयोग का क्या तर्क है?

चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए यह प्रक्रिया जरूरी है।
इसके पीछे कारण बताए गए हैं शहरीकरण और आंतरिक पलायन मृतकों के नामों को हटाना अवैध विदेशी नागरिकों के नाम हटाना युवाओं को सूची में जोड़ना आयोग ने कहा कि यह पूरा कार्य जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के तहत वैध है। INDIA गठबंधन का प्रतिनिधिमंडल जल्द ही चुनाव आयोग से मुलाकात करेगा और शिकायत दर्ज कराएगा। इसके बाद विपक्ष सड़कों पर उतर कर आंदोलन भी कर सकता है।

चुनाव कब हैं?

बिहार में नवंबर 2025 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। वहीं पश्चिम बंगाल, केरल, असम, पुडुचेरी और तमिलनाडु में 2026 में विधानसभा चुनाव होंगे। वोटर लिस्ट के इस विशेष पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग आमने-सामने हैं।
जहां एक ओर आयोग इसे सुधारात्मक कदम मान रहा है, वहीं विपक्ष इसे लोकतंत्र और गरीबों के मताधिकार पर खतरा बता रहा है।

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